कितना तुझसे अनजान था मैं

कितना तुझसे अनजान था मैं
तू कितनी छद्म भरी निकली
जब तक जी बहला साथ चली
जब जी मचला तब छोड़ चली !
कितने दुःख झेले साथ साथ
मुरझाये , टूटे, खड़े हुए
एक साथ व्योम तक जाने का
अपना वादा था भूल गयी ?
यूँ अधर में नाता तोड़ेगी ?
यूँ प्यासा व्याकुल छोड़ेगी ?
क्या सोचा था तू क्या निकली
रे ज़िन्दगी

आभाष न था , तू यूँ मुझसे रूठेगी
था कहाँ पता? यूँ सांस आखिरी टूटेगी
दो चार पहर बस रुक जा तू
मैं रिश्तों की पाँखें चुन लू
कुछ अपनो से शिकवे कह लूँ
कुछ अपनो के शिकवे सुन लूँ

16. February 2015 by admin
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